चीनी की जगह अजीनोमोटो परोसने ही वाली थी साधना पर अचानक उसकी साड़ी गुड़िया के पैर में फसने से वो गिर पड़ी सिद्धार्थ की गोद में। सावन की आत्मा एक कोने में खड़ी खुश हो रही थी कि चलो दीपा की बुरी आत्मा ने जो साधना को सबकी नजर से गिराने के लिए खेल खेला था वो कामयाब नही हुआ और सभी अजीनोमोटो खाने से बच गए।
दीपा की आत्मा तिलमिला रहीं थी । कब तक तू बचाएगा इसे?? इसने मुझसे मेरा सिद्धार्थ छीना मैं इससे इसकी जिंदगी छीन लूंगी….
गतांक से आगे...
साधना को सिद्धार्थ ने रात को एक हीरे का नोज पिन दिया।
"ओह सॉरी मैं दिन में तुम्हें देना ही भूल गया था।माँ ने मुंँहबज्जी की रस्म के लिए मुझे दिया था तुम्हें देने के लिए । तुम्हारी तबियत अचानक खराब हो गई तो वो रस्म भी ठीक से हम नहीं निभा पाए।"
"इसकी क्या जरूरत थी? वैसे भी यह तो बहुत मंहगा लग रहा है ।" साधना ने एक नजर तनिष्क के बॉक्स पर डालते हुए कहा।
"आप तो बिना देखे ही इसकी कीमत बता रहीं हैं।एक बार खोल कर देख तो लीजिए।"
"जी !"
अनमने मन से साधना ने वो छोटा सा लाल रंग का डिब्बा खोला तो वो छोटा सा कमरा जिसकी छत खपरैल से बनी थी और दीवार कच्ची ईंटो और मिट्टी से।हल्की रोशनी में वो कमरा ही उसे बहुत डरावना लग रहा था उस हीरे की चमक से और भी डरावना लगा।
साधना जब शादी के बाद सिद्धार्थ के घर आई तो घर बहुत बड़ा और अच्छा लगा।सभी सुख सुविधाओं के समान से सुसज्जित।पूरे घर में मार्बल और टाइल्स की चमक से उसे लग ही नहीं रहा था कि वो दिल्ली से दूर एक आदीवासी इलाके में है।
"रात की रसोई बहू तुम बनाओगी और फिर आज रात से सिद्धार्थ के कमरे में ही सोना।" जब शीला जी ने यह कहा तो
उसे अंदाजा ही नहीं था कि सिद्धार्थ उस घर में नहीं बल्कि इस कच्चे मकान में किराएदार की तरह रहता है।
शीला भवन दो हिस्सों में बटा हुआ था एक हिस्सा था बाहरी चमक धमक लिए हुए आधुनिकता से परिपूर्ण और दूसरा हिस्सा था गांँव देहात समान।
यह उसकी पहली रात थी जब वो अपनी ननद और जेठानी के साथ सिद्धार्थ के कमरे में जा रही थी।रात के अंधेरे में उसे लग रहा था किसी सूनसान जंगल से गुजर रही है ।
पाँच दिन हो गए थे इस घर में आए हुए पर घर के इस हिस्से से वो अनजान थी। जनवरी की कड़कड़ाती रात में आम , कटहल, पपीता, अमरूद,लीची,नीम ,केले के पेड़ हवा चलने से अंधेरे में ऐसे हिला रहे थे अपनी डालियां जैसे वो सब साधना को अपने में समेट लेंगे।
डरते डरते ही वो सिद्धार्थ के कमरे तक पहुंची थी।
"अरे! भाभी संभल कर यहाँ सामने कुआँ है।" जब छोटी ननद ने कहा तो साधना को लगा वो कूंँए में तो कूद ही चुकी है अब क्या संभले।जान बूझ कर इस अन्धकार मय जीवन को अपनाया है।
यह हिस्सा किराएदारों के लिए बना था जिसके छह हिस्से थे हर में आगे बरामदा फिर दो छोटे छोटे कमरे और उसके पीछे एक छोटी सी जगह जिसे स्टोर या गुसलखाने की तरह इस्तेमाल किया जाता था ।सबसे आगे वाले हिस्से में बड़े भाई भाभी रहते थे और सबसे पीछे वाले हिस्से में सिद्धार्थ रहता था।
"हाँ तो असली हीरा ही है यह।माँ का मन था कि मैं तुम्हें कुछ अच्छी सी चीज दूं।" सिद्धार्थ ने डरी सहमी साधना से कहा।
"आप इतना सहमी और डरी हुई क्यों लग रहीं हैं।क्या हुआ मेरे इस कमरे तक आते आते आप डर गईं। लगता है इन पांँच दिनों में पहली बार ही यहांँ आईं हैं।अब रोज यहीं आना होगा रात को माँ ने कहा है।"
दीपा की आत्मा उसी कमरे के एक कोने में दीवार से चिपकी सिद्धार्थ और साधना को देख रही थी और उनकी बातें सुन रही थी।
हीरे की लौंग का तो सिद्धार्थ ने कभी मुझसे वादा किया था कि वो हमारी सुहागरात पर मुझे देगा। पर सब भूल गया यह मुझे भूल गया... इतना आसान नहीं है दीपा को भूलना सिद्धार्थ... दीपा नहीं भूलने देगी खुद को । यह हीरे की लौंग इसके पास नहीं मेरे पास होनी चाहिए थी। गुस्से में तिलमिला रहीं थी दीपा की आत्मा। उसने छत से एक खपरा खींच कर निकाल लिया और जोर से उस बिस्तर पर पटक दिया जहाँ साधना सिद्धार्थ के साथ बैठी हुई थी।
साधना जो पहले से ही डरी हुई थी अचानक से किसी चीज के गिरने से भयभीत हो सिद्धार्थ के सीने से लिपट गई।
"अरे!डरो मत चूहा होगा।यह तो रोज ऐसे ही करता है।"
सिद्धार्थ ने साधना को अपनी बाहों में समेटे रखा जिससे उसका डर कम हो जाए।
इधर दीपा ने जब सुना सिद्धार्थ ने चूहा समझा उसे। देखना कैसे अब यही चूहा जिसे वो रोज अपनी छत पर देखता है खत्म कर देती हूंँ। दीपा खपरैल की छत पर चढ़ गई और बिल्ली बनकर चूहों को खाने लगी। खेत खलिहान पास में ही थे तो चूहे इस इलाके में ज्यादा ही हो गए थे। वो उन्हें अपने पंजों में दबोच लेती और चीखती... खत्म कर दूंगी मैं तुम सबको,किसी को जिंदा नहीं छोडूंगी..किसी को भी...। कुछ चूहे अपनी जान बचाते हुए उसके पंजे से निकलने की नाकाम कोशिश में लगे रहे।
उस छत पर होती चूहे और बिल्ली बनी दीपा की भाग दौड़ से होती आवाजों से डरी हुई साधना सिद्धार्थ की बांहों के घेरे में कब सो गई उसे पता ही नहीं चला। सिद्धार्थ रात भर जगा रहा कि कहीं साधना की नींद ना खुल जाए।
,, और सोचता रहा ..?आज इन चूहों ने तबाही मचा कर रख दी है कल सुबह होते ही छत ठीक करवाने के लिए भाई और माँ से बात करनी होगी।
क्रमश:
आपको यह कहानी पसंद आ रही है यह जानकर खुशी हुई।
इस कहानी से जुड़े रहने के लिए मेरे प्रिय पाठकों का तहे दिल से शुक्रिया। आप इसी तरह कहानी से जुड़े रहिए और अपनी समीक्षा के जरिए बताते रहिए कि आपको कहानी कैसी लग रही है।
कविता झा'काव्या कवि'
#लेखनी धारावाहिक प्रतियोगिता
Khushbu
05-Oct-2022 04:07 PM
Nice
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Gunjan Kamal
30-Sep-2022 12:12 PM
👌👏🙏🏻
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